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प्रियव्रत वंश वर्णन के माध्यम से चैतन्य की अवरोहण स्थिति का चित्रण

-         राधा गुप्ता

 

श्रीमद्भागवत महापुराण के पञ्चम स्कन्ध में प्रथम अध्याय से लेकर सप्तम अध्याय तक राजा प्रियव्रत के वंश की कथा विस्तार से वर्णित है । कथा इस महत्त्वपूर्ण तथ्य को इंगित करती है कि आत्मस्वरूप को पहचान लेने के बाद भी आत्मा के सुख, शान्ति, शुद्धता, शक्ति, ज्ञान, प्रेम तथा आनन्द गुणों का गहनता से अनुभव करने के लिए उन गुणों को जगत में बांटना आवश्यक है । चैतन्य की आरोहण तथा अवरोहण नामक दो स्थितियों में से यही अवरोहण स्थिति है जिसका चित्रण प्रस्तुत कथा में अद्भुत ढंग से किया गया है । कथा का संक्षिप्त स्वरूप इस प्रकार है –

 

कथा का संक्षिप्त स्वरूप

     स्वायम्भुव मनु के दो पुत्र थे – उत्तानपाद और प्रियव्रत । नारद जी के उपासक प्रियव्रत परमार्थ तत्त्व के बोध से युक्त थे । अतः पृथ्वीपालन के लिए आवश्यक सभी गुणों से समन्वित देखकर स्वायम्भुव मनु ने अन्हें राज्य – शासन के लिए आज्ञा दी । परन्तु प्रियव्रत ने आत्म साधना में बाधक समझकर पिता की आज्ञा को स्वीकार नहीं किया । प्रियव्रत की ऐसी प्रवृत्ति को देखकर स्वयम्भू ब्रह्मा अपने लोक से उतरे और वहां उपस्थित नारद जी, स्वायम्भुव मनु तथा प्रियव्रत द्वारा सत्कृत होकर उन्होंने प्रियव्रत को ईश्वरीय विधान समझाकर पृथ्वी पालन के लिए आज्ञा दी । परम भागवत प्रियव्रत ने ब्रह्मा जी की आज्ञा को शिरोधार्य किया और पिता को भी प्रसन्न करते हुए वे पृथ्वी का शासन करने लगे ।

     प्रियव्रत ने प्रजापति विश्वकर्मा की पुत्री बर्हिष्मती से विवाह किया जिससे उनको आग्नीध्र प्रभृति दस पुत्र और ऊर्जस्वती नाम की एक कन्या प्राप्त हुई ।

     एक बार प्रियव्रत ने यह देखकर कि सूर्य एक बार में पृथ्वी के केवल आधे भाग को ही प्रकाशित करते हैं और शेष आधा भाग अन्धकार में रहता है – उसे पसन्द नहीं किया और स्वयं एक ज्योतिर्मय रथ पर आरूढ होकर पृथ्वी की सात परिक्रमाएं कर डाली । उनके रथ के पहिये से पृथ्वी में जो सात लीकें बनी, उससे पृथ्वी में सात द्वीप और सात समुद्र बन गए । ये सात द्वीप हैं – जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौञ्च, शाक और पुष्कर जो क्रमशः क्षार, इक्षुरस, मदिरा, घी, दूध, दधि और मीठे जल के सात समुद्रों से घिरे हैं ।

     प्रियव्रत ने ग्यारह अर्बुद वर्षों तक पृथ्वी का शासन किया और फिर अपने आग्नीध्र प्रभृति पुत्रों को उपरोक्त द्वीपों का स्वामी बनाकर वे तपस्या में संलग्न हो गए ।

     पिता के तपस्या में संलग्न हो जाने पर राजा आग्नीध्र जम्बू द्वीप की प्रजा का पुत्रवत् पालन करने लगे । एक बार वे सत्पुत्र  प्राप्ति के लिए मन्दराचल की घाटी में गए और ब्रह्मा जी की आराधना करने लगे । ब्रह्मा जी ने उनकी अभिलाषा जानकर अपनी सभा की गायिका पूर्वचित्ति नाम की अप्सरा को उनके पास भेजा जो आग्नीध्र के आश्रम के पास विचरने लगी । अप्सरा के चरण – नूपुरों की ध्वनि सुनकर आग्नीध्र ने समाधि योग से मुंदे हुए अपने नेत्रों को खोला और इसी रास्ते कामदेव ने उनके हृदय में प्रवेश कर लिया । आग्नीध्र ने अप्सरा पर मुग्ध होकर उसके गर्भ से नाभि प्रभृति नौ पुत्रों को उत्पन्न किया ।

     नाभि का विवाह मेरुदेवी से हुआ परन्तु नाभि को कोई सन्तान नहीं थी । सन्तान प्राप्ति हेतु उन्होंने अपनी भार्या मेरुदेवी के साथ ऋत्विजों की सहायता से भगवान् यज्ञपुरुष का यजन किया । भगवान् प्रकट हुए जिससे ऋत्विज, सदस्य और यजमान अत्यन्त आह्लादित हुए और भगवान् की स्तुति करने लगे । ऋत्विजों ने भगवान् से राजर्षि नाभि के लिए पुत्र प्राप्ति का वरदान मांगा । भगवान् अपनी अंशकला से अवतरित होने का वरदान देकर अन्तर्धान हो गए और तदनुरूप मेरुदेवी के गर्भ से भगवान् ऋषभ प्रकट हुए । जब नाभि ने देखा कि मन्त्रिमण्डल, नागरिक और राष्ट्र की जनता ऋषभदेव से बहुत स्नेह रखती है, तब वे ऋषभ को राज्याभिषिक्त करके मेरुदेवी के साथ बदरिकाश्रम को चले गए ।

     भगवान् ऋषभ दिगम्बर, संन्यासी, ऊर्ध्वरेता, आत्मिक आनन्द से युक्त और परमात्म स्वरूप में स्थित थे । एक बार इन्द्र ने ईर्ष्यावश उनके राज्य में वर्षा नहीं की । तब भगवान् ऋषभ ने इन्द्र की मूर्खता पर हंसते हुए अपनी योगमाया से अजनाभखण्ड में खूब जल बरसाया । ऋषभ ने इन्द्र – कन्या जयन्ती से विवाह किया और अपने समान गुण वाले सौ पुत्र उत्पन्न किए । उनके सभी पुत्र सुसमाहित चित्त से युक्त थे और भरत उनमें सबसे बडे थे । ऋषभ ने पृथ्वी का पालन करने के लिए भरत को राजगद्दी पर बैठाया और शेष पुत्रों को भरत का ही अनुसरण करने का उपदेश दिया । ऋषभ ने स्वयं जड, अन्ध, मूक, बधिर तथा उन्मत्त के समान विचरते हुए अवधूत धर्म ग्रहण कर लिया, अनेक योगचर्याओं का आचरण किया, गौ, काक, मृग तथा अजगर आदि अनेक वृत्तियों को स्वीकार किया तथा स्वयं उपस्थित हुई सिद्धियों को भी ग्रहण नहीं किया ।

     ऋषभ – पुत्र भरत ने पिता की आज्ञानुसार पृथ्वी की रक्षा का भार ग्रहण करके विश्वरूप की कन्या पञ्चजनी से विवाह किया जिससे उनके सुमति, राष्ट्रभृत्, सुदर्शन, आवरण और धूम्रकेतु नामक पांच पुत्र हुए । राजा भरत के समय से ही अजनाभवर्ष को भारतवर्ष कहा जाने लगा ।

कथा की प्रतीकात्मकता

प्रस्तुत कथा पूर्णरूपेण प्रतीकात्मक है । एक – एक प्रतीक को समझकर ही कथा को समझा जा सकता है । अतः सर्वप्रथम कथा के सभी प्रतीकों को समझने का प्रयास करें –

१. स्वायम्भुव मनु – मनुष्य का मन जब देह और देह के भोगों से बंधा रहता है, तब निम्न कहलाता है और इस निम्न मन की स्थिति में चेतना के विकास की सम्भावनाएं नगण्य ही रहती हैं । परन्तु यही मन जब देह और देह के भोगों से ऊपर उठ जाता है, तब उच्च कहलाता है और यहीं से मनुष्य चेतना का विकास प्रारम्भ होता है । पौराणिक साहित्य में इस उच्च मन को ही स्वायम्भुव मनु कहा गया है । मनु का अर्थ है – मन और इस मन का निम्न से उच्च हो जाना स्वयम्भू ब्रह्मा अर्थात् बृंहणशील मन का एक विशिष्ट गुण है जिसे कथा में स्वयम्भू ब्रह्मा का स्वायम्भुव मनु नामक पुत्र कहकर इंगित किया गया है ।

२. प्रियव्रत – इस उच्च मन अर्थात् स्वायम्भुव मनु के भी दो गुण(पुत्र) हैं । एक है – आरोहण अर्थात् ऊर्ध्वविकास जिसे उत्तानपाद नामक पुत्र कहा गया है तथा दूसरा है – अवरोहण अर्थात् क्षैतिज विकास जिसे प्रियव्रत नामक पुत्र कहकर इंगित किया गया है । प्रियव्रत का अर्थ है – प्रिय – व्रत अर्थात् प्रिय नियम । देहभाव से ऊपर उठकर आत्मा में स्थित हुए मन का आत्मा के सुख, शान्ति, शक्ति, शुद्धता, ज्ञान, प्रेम तथा आनन्द प्रभृति गुणों से आप्लावित हो जाना एक प्रिय नियम है अर्थात् आरोहण प्रक्रिया के द्वारा मन जैसे ही आत्मस्थ होता है, वैसे ही वह आत्मस्थ मन आत्मा के सुख, शान्ति, शुद्धता, प्रेम तथा आनन्द प्रभृति गुणों से सहज रूप से ओतप्रोत हो जाता है जो अवरोहण प्रक्रिया का पहला चरण है । इस तथ्य को ही कथा में यह कहकर इंगित किया गया है कि राजा प्रियव्रत ने एक ज्योतिर्मय रथ पर आरूढ होकर पृथ्वी की सात परिक्रमाएं की और उनके रथ के पहिये से जो सात लीकें बनी, वे ही पृथ्वी में सात समुद्र तथा सात द्वीप बन गए ।

३. सात द्वीप और सात समुद्र – ऐसा प्रतीत होता है कि आत्मस्थ होने पर मन रूपी पृथ्वी जिन सात संकल्पों तथा तदनुरूप सात भावों से आप्लावित हो जाती है – इन्हें ही यहां सात द्वीप और सात समुद्र कहा गया है ।

I- मैं आत्मा आनन्दस्वरूप हूं – इस संकल्प को जम्बूद्वीप तथा तदनुगत आनन्द भाव  को मीठे जल का समुद्र कहा जा सकता है । चूंकि आनन्द भाव में सुख – शान्ति प्रभृति सभी भावों का अन्तर्भाव भी होता है, इसलिए आत्मा को केवल आनन्दस्वरूप भी कहा जाता है ।

II- मैं आत्मा शुद्धस्वरूप हूं – इस संकल्प को प्लक्षद्वीप तथा तदनुगत शुद्धता के भाव को क्षार समुद्र कहा जा सकता है । प्लक्ष शब्द प्रक्ष् धातु का तद्भव रूप प्रतीत होता है, जिसका अर्थ है – प्रक्षालन करना, शुद्ध करना । 

III- मैं आत्मा सुखस्वरूप हूं – इस संकल्प को शाल्मलि द्वीप तथा तदनुगत सुख के भाव को इक्षुरस का समुद्र कहा जा सकता है । शाल्मलि शब्द शर्मन् से बना प्रतीत होता है जिसका अर्थ है – खुशी, प्रसन्नता ।

IV- मैं आत्मा शान्तस्वरूप हूं – इस संकल्प को कुशद्वीप तथा तदनुगत शान्ति के भाव को मदिरा का समुद्र कहा जा सकता है । कुश(कु – श) का अर्थ है – ध्वनि का शमन अर्थात् शान्ति ।

V- मैं आत्मा ज्ञानस्वरूप हूं – इस संकल्प को क्रौञ्चद्वीप तथा तदनुगत ज्ञानभाव को घृत का समुद्र कहा जा सकता है । क्रौञ्च शब्द कुच् धातु से बना प्रतीत होता है जिसका अर्थ है – चमकाना । ज्ञान भी जीवन को चमकाता अर्थात् प्रकाशित करता है ।

VI- मैं आत्मा शक्तिस्वरूप हूं – इस संकल्प को शाकद्वीप तथा तदनुगत शक्ति के भाव को दुग्ध का समुद्र कहा जा सकता है । शाक शब्द का अर्थ है – शक्ति, सामर्थ्य ।

VII -मैं आत्मा प्रेमस्वरूप हूं – इस संकल्प को पुष्कर द्वीप तथा तदनुगत प्रेमभाव को मट्ठे का समुद्र कहा जा सकता है । पुष्कर (पुष्कं पुष्टिं राति) शब्द का अर्थ है – पुष्टि प्रदान करना । प्रेम मानसिक, सामाजिक तथा शारीरिक सभी स्तरों पर पुष्टि प्रदान करता है ।

४. बर्हिष्मती – कथा में बर्हिष्मती को प्रियव्रत की पत्नी कहकर सम्बोधित किया गया है । बर्हिष्मती शब्द में बर्हि शब्द बृह् धातु से बना है जिसका अर्थ है – वर्धन करना । मती प्रत्यय से युक्त होने पर बर्हिष्मती का अर्थ हुआ – वर्धनयुक्त । मन जब अवरोहण करता है, तब मनश्चेतना भी वर्धनयुक्त होती है और इस वर्धनयुक्त मनश्चेतना के सहयोग से ही अवरोहण यात्रा का प्रारम्भ सम्भव हो पाता है ।

५. आग्नीध्र – आग्नीध्र शब्द अग्नि शब्द में इन्ध धातु के योग से बना प्रतीत होता है जिसका अर्थ है – अग्नि(चेतना) का दीपन अर्थात् ऐसा मन जिसकी अग्नि(चेतना) दीप्त हो गई हो । श्री विपिन कुमार ने वैदिक संदर्भों के आधार पर कहा है आग्नीध्र के पास ओंकार का बल है । वह सारी पृथ्वी को ओंकार की कला से अभिभूत कर देना चाहता है । वह आकाश और पृथ्वी के बीच अन्तरिक्ष में स्थित है, इसलिए बहिर्मुखी भी हो सकता है और अन्तर्मुखी भी ।(द्रष्टव्य – पुराण विषय अनुक्रमणिका में आग्नीध्र शब्द पर टिप्पणी ) । इस आधार पर कहा जा सकता है कि जब मन एक ओर तो आनन्दस्वरूप आत्मा से जुडा रहता है और दूसरी ओर उस आनन्द को जीवन में अभिव्यक्त भी करने लगता है, तब आग्नीध्र कहलाता है ।

        तात्पर्य यह है कि प्रियव्रत स्थिति में जहां मन सुख – शान्ति – शुद्धता – प्रेम तथा आनन्द प्रभृति आत्मगुणों के संकल्पों और भावों से आप्लावित रहता है, वहीं आग्नीध्र स्थिति में वे सब भाव अथवा उन भावों का एकत्वरूप आनन्द जीवन में अभिव्यक्त भी होने लगता है । इसलिए प्रियव्रत स्थिति को अवरोहण यात्रा का पहला चरण तथा आग्नीध्र स्थिति को दूसरा चरण कहा जा सकता है । परन्तु चूंकि आग्नीध्र स्थिति प्रियव्रत स्थिति के बाद ही घटित हो सकती है, इसलिए कथा में आग्नीध्र को प्रियव्रत का पुत्र कहना युक्तसंगत ही है ।

६. पूर्वचित्ति अप्सरा – पूर्वचित्ति शब्द में पूर्व का अर्थ है – पहले से ही विद्यमान तथा चिति का अर्थ है – संग्रह या परत । अतः पूर्वचिति(पूर्व – चित्ति) का अर्थ है – पहले से ही विद्यमान आत्म-भावों या आत्म – गुणों का संग्रह । अप्सरा(अप् – सरा) का अर्थ है – उन आत्म-भावों को अभिव्यक्त करने वाली शक्ति या प्रवृत्ति । अथवा ऐसा भी कह सकते हैं कि जो शक्ति आनन्दमय कोष में विद्यमान आनन्द आदि आत्म-भावों को मनोमयादि निचले कोषों में अभिव्यक्त करती है, वह पूर्वचित्ति अप्सरा है ।

        आग्नीध्र स्थिति में आत्मा के सुख- शान्ति – शुद्धता आदि भाव जीवन में अभिव्यक्त होने लगते हैं और शुद्ध मन उस अभिव्यक्ति पर अत्यन्त मुग्ध होता है जिसे कथा में पूर्वचित्ति अप्सरा पर आग्नीध्र की आसक्ति कहकर इंगित किया गया है ।

       कथा में कहा गया है कि आग्नीध्र ने मन्दराचल की घाटी में बैठकर जब ब्रह्मा जी की आराधना की, तब पूर्वचित्ति अप्सरा प्रकट हुई । मन्दराचल का अर्थ है – मम – दृ – अचल अर्थात् मैं – मेरे के संकल्प को विदीर्ण करके स्थिर हो जाना और आग्नीध्र का अर्थ है – आत्मस्थ शुद्ध श्रेष्ठ मन । ब्रह्मा जी की आराधना का अर्थ है – सृष्टिकर्त्ता की शक्ति के नियम का क्रियान्वयन । कथन का तात्पर्य यह है कि मन के अत्यन्त शुद्ध और स्थिर हो जाने पर सुख – शान्ति – शुद्धता – प्रेम – आनन्द प्रभृति आत्मगुणों का प्रकट होना सृष्टिकर्त्ता के नियमानुसार अत्यन्त स्वाभाविक और सहज ही है ।

७. नाभि – नाभि का अर्थ है – केन्द्र में अर्थात् परमात्मा के योग में स्थित मन । अवरोहण यात्रा का यह तीसरा चरण है । अवरोहण यात्रा के पहले चरण में अर्थात् प्रियव्रत स्थिति में मनुष्य का मन सुख – शान्ति प्रभृति आत्मगुणों के संकल्पों तथा भावों से आप्लावित रहता है । दूसरे चरण में अर्थात् आग्नीध्र स्थिति में उन भावों पर अथवा उन भावों के एकत्वस्वरूप आनन्दभाव पर मुग्ध रहता है । अब तीसरे चरण में उन आत्मगुणों का जगत में अथवा सम्बन्धों में फैलाव हो जाना चाहिए । परन्तु ऐसा नहीं होता । नाभि नामक पात्र के माध्यम से यह संकेत किया गया है कि आत्मगुणों को जगत में बांटने से पहले आत्मगुणों से ओतप्रोत मन का उन आत्मगुणों के मूलस्रोत परमात्मा से जुडना अनिवार्य है । तात्पर्य यह है कि आत्मा तो सुख – शान्ति आदि का स्वरूप ही है परन्तु परमात्मा इन सभी गुणों का सागर है और परमात्मा से जुडकर ही मनुष्य सुख – शान्ति – प्रेम – आनन्द आदि गुणों को जगत में निरन्तर बांट सकता है, ठीक उसी प्रकार जैसे किसी अदृश्य जलस्रोत से जुडे रहने पर ही कुआं निरन्तर जल प्रदान करता है ।

        कथा में कहा गया है कि पुत्र प्राप्ति हेतु नाभि ने ऋत्विजों के साथ यज्ञपुरुष का यजन किया जिससे वासुदेव के दर्शन एवं अनुग्रह के फलस्वरूप उन्हें ऋषभ नामक पुत्र प्राप्त हुआ ।

        नाभि अर्थात् परमात्मा के योग में स्थित मन की वृत्तियों ( व्यापारों) को ऋत्विज कहा जा सकता है ।

        यज्ञपुरुष के यजन का अर्थ है – इस प्रवाहमान सृष्टि रूपी यज्ञ को सर्वथा उचित एवं कल्याणकारी समझते हुए श्रद्धापूर्वक कर्म करना ।

         वासुदेव के दर्शन का अर्थ है – पालनकर्त्ता शक्ति के प्रति परम अनुग्रह के भाव से युक्त होना ।

        तथा ऋषभ की प्राप्ति का अर्थ है – श्रेष्ठ व्यक्तित्व का अवतरण ।

        तात्पर्य यह है कि नाभि स्थिति में रहकर उपर्युक्त प्रकार से व्यवहार करते हुए जो दृष्टि – परिवर्तन(change of perception ) घटित होता है, उससे एक श्रेष्ठ व्यक्तित्व अवतरित होता है जिसे कथा में ऋषभ कहा गया है । यहां इस महत्त्वपूर्ण तथ्य की ओर संकेत किया गया है कि अब मनुष्य सुख अथवा आनन्द की प्राप्ति के लिए कर्म नहीं करता, अपितु सुख में रहकर कर्म करता है (being में रहकर doing में जाना)  जिससे कर्म करना बोझ नहीं रहता और कर्म आनन्दपूर्ण हो जाता है ।

८. मेरुदेवी – मेरुदेवी को राजर्षि नाभि की पत्नी कहा गया है । मेरु का अर्थ है – वह परम सत्ता जहां जगत का प्रारम्भ भी है और अन्त भी । ठीक उसी प्रकार जैसे माला में एक दाना मेरु कहलाता है और माला का प्रारम्भ और अन्त इसी मेरु पर होता है । पौराणिक साहित्य में पत्नी सर्वत्र शक्ति का प्रतीक है । अतः  यहां भी पत्नी मेरुदेवी के माध्यम से नाभि नामक पात्र की परमात्मनिष्ठता को संकेतित किया गया है ।

९. ऋषभ – अवरोहण यात्रा में ऊपर वर्णित प्रियव्रत, आग्नीध्र और नाभि नामक तीनों चरणों को पार करके जो श्रेष्ठ चेतना अवतरित होती है, उसे कथा में भगवान् का ऋषभ नामक अवतार कहा गया है । ऋषभ शब्द का अर्थ ही है – श्रेष्ठ । यह ऋषभ चेतना शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक सभी दृष्टियों से विशिष्ट होती है जिसका संकेत कथा में ऋषभ चरित्र के विस्तृत वर्णन के माध्यम से प्राप्त होता है । संक्षेप में यह चेतना दिगम्बर अर्थात् मन – बुद्धि के ऊपर छाए हुए सभी आवरणों से रहित, संन्यासी अर्थात् सम्यक् प्रकार से आत्मस्वरूप में न्यस्त(स्थित), ऊर्ध्वरेता अर्थात् सदैव ऊर्ध्वमुखी चेतना से युक्त, अनासक्त अर्थात् सर्वथा आसक्ति से रहित, अतः साक्षीभाव में स्थित, आन्तरिक आनन्द से युक्त अर्थात् इन्द्रियात्मक भोगों से प्राप्त सुख – दुः ख से सर्वथा परे और परमात्मकेन्द्रित जीवन से सम्पन्न होती है जिसे कथा में अजनाभखण्ड में निवास करना कहा गया है ।

१०. ऋषभ का इन्द्र – कन्या जयन्ती से विवाह – इन्द्र – कन्या जयन्ती से विवाह का अर्थ है – मन की शासन एवं नियन्त्रण शक्ति (ruling and controlling power) से युक्त होना । इसीलिए ऋषभ चेतना से सम्पन्न मनुष्य के सभी संकल्प ज्ञान – विज्ञान से युक्त होते हैं जिन्हें ऋषभ – जयन्ती के सौ पुत्र कहकर इंगित किया गया है । उनमें सबसे बडा है – भरत । भरत अर्थात् सुख – शान्ति- शुद्धता – प्रेम – आनन्द रूप आत्मगुणों के उस भार को जगत में फैलाना अथवा बांटना जिस भार से वह स्वयं भर गया होता है । ऋषभ चेतना के शेष सभी संकल्प इसी भरत मन का अनुसरण करते हैं जिसे कथा में भगवान् ऋषभ द्वारा अपने सभी पुत्रों को सबसे बडे भाई भरत का अनुगमन करने की शिक्षा देने के रूप में इंगित किया गया है । 

११. भरत – अवरोहण यात्रा का अन्तिम और पांचवां चरण है – भरत । भरत शब्द का अभिप्राय है – भऱं – तनोति अर्थात् भार(संग्रह, समुच्चय) को फैलाने वाला, बांटने वाला, देने वाला अथवा विस्तारित करने वाला । आत्मा के सुख, शान्ति, शुद्धता, शक्ति, प्रेम, ज्ञान तथा आनन्द रूप सात गुणों के समुच्चय को ही यहां भार कहा गया है । अतः जो मन इन आत्मगुणों को जीवन में, जगत में अथवा सम्बन्धों में बांटता है, देता है – वह भरत है ।

१२. भरत का विश्वरूप की कन्या पञ्चजनी से विवाह –

पञ्चजनी को भरत की पत्नी कहा गया है । पञ्चजनी शब्द पञ्च तथा जनी नामक दो शब्दों के मेल से बना है । पञ्च का अर्थ है – पांच और जनी का अर्थ है – उत्पन्न करने वाली । पांच महाभूतों को उत्पन्न करने के कारण प्रकृति शक्ति को पंचजनी कहा जा सकता है । कथा में उसे विश्वरूप की कन्या भी कहा गया है । कन्या शब्द पौराणिक साहित्य में विशेषता का द्योतक है । एक ही परमसत्ता जब अनन्त नाम रूप धारण करती है, तब विश्वरूप हो जाती है और इस विश्वरूप की प्रधान विशेषता है – पंचभूतों को उत्पन्न करने वाली सतत् परिवर्तनशील प्रकृति अर्थात् विश्वरूप की सत्ता सतत् परिवर्तनशील प्रकृति के कारण ही सम्भव है । अतः यहां विश्वरूप की कन्या पंचजनी को भरत की पत्नी कहकर यह संकेतित करने का प्रयास किया गया है कि भरत मन सतत् परिवर्तनशील प्रकृति को अपनी शक्ति बना लेता है । वह जीवन में उपस्थित किसी भी परिवर्तन से विचलित नहीं होता प्रत्युत अनुकूल अथवा प्रतिकूल प्रत्येक परिवर्तन को स्वीकार करता है । तात्पर्य यह है कि सुख – शान्ति – प्रेम – आनन्द को बांटने में कोई भी स्थिति – परिस्थिति आडे नहीं आती । उदाहरण के लिए, सम्पर्क में आने वाला व्यक्ति कितना भी क्रोधी हो – भरत मन शान्ति ही बांटता है , व्यक्ति कितना भी घृणा से भरा हो, भरत मन प्रेम ही बांटता है, व्यक्ति कितना भी दुराचारी अथवा दुष्ट हो, भरत मन शुद्धता ही बांटता है तथा परिस्थिति कैसी भी विषम अथवा दुःखपूर्ण हो – भरत मन शक्ति और सुख की तरंगें ही प्रवाहित करता है ।

१३. भरत के पांच पुत्र – कथा में भरत और पञ्चजनी के पांच पुत्र बतलाए गए हैं। उनके नाम हैं – सुमति, सुदर्शन, राष्ट्रभृत, आवरण और धूम्रकेतु । सुमति(स्वमति) का अर्थ है – अपने अनुकूल । सुदर्शन का अर्थ है – देखने में श्रेष्ठ, सुन्दर । राष्ट्रभृत का अर्थ है – राष्ट्र अर्थात् व्यक्तित्व का भरण करने वाली । आवरण का अर्थ है – व्यक्तित्व को अथवा जीवन को ढंक देने वाली और धूम्रकेतु का अर्थ है – अत्यन्त अज्ञानपूर्ण । इन पांच पुत्रों के रूप में यहां परिवर्तनशील प्रकृति की पांच स्थितियों की ओर ही संकेत किया गया प्रतीत होता है ।

१४. प्रियव्रत का नारद – उपासक होना – कथा में प्रियव्रत को नारद जी का उपासक कहा गया है । पौराणिक साहित्य का नारद नामक पात्र प्रकृति में क्रियाशील आकर्षण के नियम( law of attraction) को इंगित करता है । इसका तात्पर्य यह है कि मनुष्य अपने विचारों के माध्यम से जैसी ऊर्जा प्रवाहित करता है, वैसी ही ऊर्जा अधिक प्रबल होकर उसके पास वापस लौटती है । अतः नारद – उपासक कहकर यह संकेत किया गया है कि प्रियव्रत नामक पात्र आध्यात्मिक साधना की आरोहण तथा अवरोहण नामक दो स्थितियों में से अवरोहण स्थिति का द्योतक है क्योंकि अवरोहण स्थिति का मूल भाव ही यह है कि आत्म – साक्षात्कार रूप आरोहण द्वारा मनुष्य में जिन सुख – शान्ति – प्रेम – आनन्द प्रभृति आत्मगुणों को प्राप्त किया है – उन्हीं आत्मगुणों को जगत में बांटना है, देना है । देने से उन आत्मगुणों की ऊर्जा अधिक प्रबल होकर देने वाले को पुनः प्राप्त हो जाती है ।

१५. कथा के प्रारम्भ में कहा गया है कि प्रियव्रत ने स्वायम्भुव मनु की राज्यशासन की आज्ञा को तो स्वीकार नहीं किया परन्तु ब्रह्मा जी ने जब ईश्वरीय विधान को समझाकर उन्हें राज्यशासन के लिए प्रेरित किया, तब प्रियव्रत ने उसे स्वीकार कर लिया ।

       इस कथन द्वारा अवरोहण की अनिवार्यता की ओर संकेत किया गया है । आरोहण अर्थात् आत्मस्थ होने से मनुष्य को जिस सुख – शान्ति की प्राप्ति होती है, उसकी अनुभूति इतनी अच्छी होती है कि मनुष्य – मन उसी में रमना चाहता है परन्तु यह आध्यात्मिक साधना की पूर्णता नहीं है । यह यात्रा का केवल आधा भाग है । शेष आधा भाग अवरोहण अर्थात् आत्मगुणों को जगत में, सम्बन्धों में बांटने पर ही सम्पन्न होता है । यही ईश्वरीय विधान है और मानव जीवन का उद्देश्य भी यही है ।