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हिरण्यकशिपु एवं प्रह्लाद की कथा द्वारा मन - बुद्धि में विद्यमान देहभाव के आत्मभाव में रूपान्तरण का चित्रण

 - राधा गुप्ता

          श्रीमद्भागवत महापुराण के सप्तम स्कन्ध में प्रथम अध्याय से लेकर दशम अध्याय तक हिरण्यकशिपु एवं प्रह्लाद की कथा का विस्तार से वर्णन है । कथा पूर्णरूप से प्रतीकात्मक है और मनुष्य के मन - बुद्धि में बसे देहभाव( देहाभिमान) के आत्मभाव(आत्माभिमान) में रूपान्तरित होने से सम्बन्धित है । कथा के अभिप्राय को समझने के लिए सर्वप्रथम उसके पौराणिक स्वरूप को जान लेना आवश्यक है ।

कथा का संक्षिप्त स्वरूप

कश्यप ऋषि की अनेक पत्नियों में से एक थी दिति । दिति के दो पुत्र थे - हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष । पृथ्वी का उद्धार करने के लिए भगवान् ने वराह अवतार ग्रहण करके हिरण्याक्ष का वध कर दिया । इससे हिरण्यकशिपु कुपित होकर भगवान् का विद्वेषी हो गया । वह भगवान् को प्रिय लगने वाली सभी शक्तियों - देवता, ऋषि, पितर, ब्राह्मण, गौ, वेद तथा धर्म से भी द्वेष करता और उन्हें उत्पीडित करता । उसने अजर, अमर और संसार का एकछत्र सम्राट् होने के लिए कठोर तप किया, जिससे ब्रह्मा जी प्रसन्न हो गए । ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त करके वह समस्त प्रकृति को अपने आधीन करके संसार का एकछत्र सम्राट् होकर समस्त प्राकृतिक शक्तियों से अवध्य हो गया । सारी प्रकृति हिरण्यकशिपु के अधिकार में आ गई थी, इसलिए वह जो चाहता, जैसा चाहता, प्रकृति उसे समर्पित करती । इस प्रकार वह समस्त विषयों का स्वच्छन्द उपभोग करता । हिरण्यकशिपु के अमर्यादित आचरण से देवता अत्यन्त पीडित हुए और भगवान् की शरण में पहुंचे । भगवान् ने हिरण्यकशिपु के वध का आश्वासन देकर देवताओं को उद्वेगरहित कर दिया ।

          हिरण्यकशिपु के चार पुत्रों में से सबसे छोटे पुत्र का नाम था प्रह्लाद । प्रह्लाद भगवान् के परमप्रेमी भक्त, संतसेवी, आत्मज्ञानी तथा महात्मा थे । पिता की इच्छा के अनुसार वे पिता को जगत् का स्वामी न मानकर परमात्मा को ही जगत् का एकमात्र आधार एवं स्वामी स्वीकार करते थे ।  हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को भगवद्भक्ति से विमुख करने का पर्याप्त प्रयत्न किया परन्तु सफल न होने पर उन्हें मार डालने का भी अनेक प्रकार से प्रयत्न किया । कभी हाथी के पैरों तले कुचलवाया, कभी सर्पों से डसवाया, कभी आग में जलवाया, कभी आंधी में रखा, कभी समुद्र में जलवाया, कभी पर्वत से फिंकवाया, कभी अंधेरी कोठरी में बन्द कराया तथा कभी मायाओं का प्रयोग आदि कराया परन्तु प्रह्लाद मरे नहीं ।

          एक दिन पिता के बहुत समझाने पर भी जब प्रह्लाद ने राजमहल के स्तम्भ में भी परमात्मा की उपस्थिति का समर्थन करते हुए परमात्मा को ही जगत का स्वामी बतलाया, तब हिरण्यकशिपु क्रोध में आगबबूला हो गया । उसने सिंहासन से कूदकर उस स्तम्भ पर तलवार से प्रहार किया । स्तम्भ से नृसिंह भगवान् प्रकट हुए और उन्होंने हिरण्यकशिपु को अपनी जंघाओं पर लिटाकर मार डाला । हिण्यकशिपु के वध से देवताओं सहित समस्त प्रकृति प्रसन्न हो गई और उन्होंने पृथक् - पृथक् नृसिंह भगवान् की स्तुति की । भक्त प्रह्लाद की स्तुति से प्रसन्न होकर भगवान् ने उन्हें इच्छित वर मांगने के लिए कहा । प्रह्लाद ने भगवद्भक्ति के साथ - साथ अपने पिता की दुस्तर दोष से शुद्धि हेतु प्रार्थना की । उसी समय ब्रह्मा जी का आगमन हुआ और उनकी पूजा को स्वीकार करके नृसिंह भगवान् अन्तर्धान हो गए । अन्त में शुक्राचार्य आदि मुनियों के साथ मिलकर ब्रह्मा जी ने प्रह्लाद को दैत्यों और दानवों के अधिपति पद पर विभूषित कर दिया ।

          प्रस्तुत कथा में अनेक वर्णन ऐसे भी हैं जो कथा को विस्तार प्रदान करते हैं । परन्तु वे सब वर्णन हिरण्यकशिपु एवं प्रह्लाद की प्रकृति(स्वभाव) को इंगित करने के लिए ही समाविष्ट हुए हैं । उनका मूलकथा में कोई पृथक् योगदान प्रतीत नहीं होता ।

कथा की प्रतीकात्मकता

कथा को समझने के लिए कथा के प्रमुख प्रतीकों को समझना अनिवार्य एवं उपयोगी होगा ।

१. दिति - प्रत्येक मनुष्य आत्मा और देह का एक योग है । आत्मा मनुष्य का अपना स्वरूप है । वह एक चेतन शक्ति है जो देह(स्थूल, सूक्ष्म , कारण) नामक यन्त्र के माध्यम से अभिव्यक्त होती है । आत्मा और देह के इस योग को जानकर तदनुसार व्यवहार करने से चेतना की एक अखण्डित स्थिति का निर्माण होता है जिसे पौराणिक साहित्य में अदिति कहा गया है । इसके विपरीत, जब मनुष्य आत्मा अथवा आत्मस्वरूप को भूलकर देह नामक यन्त्र को ही सब कुछ समझ बैठता है, तब चेतना की अखण्डित स्थिति खण्डित हो जाती है और इस खण्डित चेतना को ही पौराणिक साहित्य में दिति नाम दिया गया है । आधुनिक शब्दावली में हम अदिति को आत्म - चेतना तथा दिति को देह चेतना कह सकते हैं ।

२. हिरण्यकशिपु - इस दिति अर्थात् देह - चेतना से देह भाव जिसे देहाभिमान अथवा देहदृष्टि भी कहते हैं - का जन्म होता है । देहभाव अथवा देहाभिमान को ही कथा में हिरण्यकशिपु नाम दिया गया है । दिति चेतना से उत्पन्न होने के कारण ही उसे दिति का पुत्र कहा गया है । हिरण्यकशिपु शब्द भी इस देहभाव को ही सूचित करता है । हिरण्यकशिपु शब्द में हिरण्य का अर्थ है - स्वर्णिम तथा कशिपु का अर्थ है - चटाई अथवा बिस्तर । भौतिक आकर्षण स्वर्णिम होते हैं, इसीलिए आकर्षित करते हैं । अतः जो मनश्चेतना भौतिक आकर्षणों की चटाई अर्थात् देहभाव में स्थित है, वह हिरण्यकशिपु है ।

          कथा में हिरण्यकशिपु का चरित्र विस्तार से वर्णित है । इस वर्णन द्वारा देहभाव अथवा देहाभिमान के स्वरूप को ही समझाने का प्रयास किया गया है । देहभाव अथवा देहाभिमान में मन - वचन - कर्म की एकरूपता नहीं होती । मनुष्य सोचता कुछ और है, कहता कुछ और है तथा करता कुछ और है । भ्राता हिरण्याक्ष की मृत्यु होने पर हिरण्यकशिपु सभी दु:खी स्वजनों को आत्मज्ञानी की भांति उपदेश देता है, जिसमें देह की क्षणभङ्गुरता को व्यक्त किया जाता है । परन्तु दूसरी ओर वह स्वयं संसार का एकछत्र सम्राट् होने के लिए तप करता है तथा तप से समस्त प्रकृति को अपने आधीन करके विषयोन्मुख होकर इन्द्रियों के वशीभूत बना रहता है । एक ओर वह आत्मा की अमरता का वर्णन करता है तो दूसरी ओर आत्मस्वरूप की विस्मृति के कारण शरीर से ही अजर - अमर होने की इच्छा करता है ।

          देहचेतना रूपी दिति से देहभाव(हिरण्यकशिपु) और भोगभाव(हिरण्याक्ष) दोनों उत्पन्न होते हैं, इसलिए कथा में हिरण्याक्ष को हिरण्यकशिपु का भाई कहकर इंगित किया गया है । देहभाव का सुदृढ बल और आधार भोगभाव ही है क्योंकि भोग भाव का नाश होने पर निस्सन्देह रूप से देहभाव भी खतरे में पड जाता है । इसीलिए कथा में हिरण्याक्ष का वध हो जाने पर हिरण्यकशिपु को क्रोधयुक्त तथा हिरण्याक्ष का वध करने वाले भगवान् का विद्वेषी कहा गया है ।

          देहभाव(देहाभिमान ) आत्मा अथवा आत्मा की आवाज को सहन नहीं कर पाता क्योंकि आत्मा की आवाज को सुनने का अर्थ है - देहभाव की समाप्ति । अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए देहभाव आत्मा अथवा आत्मा की आवाज को सतत् नष्ट करना चाहता है, जिसे कथा में हिण्यकशिपु द्वारा प्रह्लाद वध की चेष्टाओं के रूप में इंगित किया गया है ।

३. प्रह्लाद(प्र+ह्लाद) का अर्थ है - प्रकृष्ट (विशिष्ट) प्रसन्नता या उल्लास । प्रकृष्ट प्रसन्नता आनन्द का वाचक है तथा आत्मा का स्वरूप है, इसलिए प्रह्लाद नामक पात्र आत्मा का प्रतिनिधित्व करता है । कथा में प्रह्लाद के माध्यम से परमात्मस्वरूप का जो विस्तृत विवेचन किया गया है, उसका उद्देश्य भी प्रह्लाद की आत्मस्वरूपता को ही इंगित करना है ।

          कथा में प्रह्लाद को हिरण्यकशिपु का पुत्र एवं भगवद्भक्त कहा गया है । हिरण्यकशिपु प्रबल देहभाव का तथा प्रह्लाद आत्मा का प्रतीक है, इसलिए एक प्रश्न स्वभावतः उपस्थित होता है कि प्रबल देहभाव(हिरण्यकशिपु) से आत्मा ( प्रह्लाद) की उत्पत्ति कैसे सम्भव है?

          वास्तव में प्रह्लाद को हिरण्यकशिपु का पुत्र कहकर हमारा ध्यान इस विशिष्ट तथ्य की ओर आकर्षित किया गया है कि प्रबल देहभाव (हिरण्यकशिपु) की स्थिति में भी मनुष्य का आत्मा पूर्णतः प्रसुप्त नहीं होता । आत्मा अति अनुग्रहशील है, इसलिए वह अत्यन्त धीमे - धीमे ही सही, परन्तु लगातार मनुष्य के मन - बुद्धि के द्वार को परमात्मस्वरूप के जागरण रूप सद्ज्ञान के प्रति खटखटाता रहता है । पहले देहाभिमान की विद्यमानता तथा बाद में अनुग्रहशील आत्मा द्वारा उसके द्वार का खटखटाना ही प्रह्लाद का हिरण्यकशिपु का पुत्र होना है ।

          प्रबल देहभाव की स्थिति में आत्मा के अनुग्रहशील होने को ही कथा में प्रह्लाद का 'भगवद्भक्त' होना कहा गया है । आत्मा प्रत्येक मनुष्य को उसके वास्तविक आत्म - स्वरूप में स्थित कराना चाहता है - यही उसकी अनुग्रहशीलता है ।

          प्रबल देहाभिमान की स्थिति में चूंकि अनुग्रहशील आत्मा बहुत धीमी आवाज में ही मनुष्य के मन - बुद्धि के द्वार को खटखटाता है, इसीलिए प्रह्लाद को ५ वर्ष का बालक कहकर इंगित किया गया है ।

          कथा में प्रह्लाद को असुर भक्त कहकर निरूपित किया गया है । चूंकि देहभाव एक आसुरी भाव है, इसलिए इस आसुरी भाव से मनुष्य के मन को मुक्त करने के लिए उपस्थित हुई अनुग्रहशील आत्मा(प्रह्लाद ) को असुर भक्त कहना सर्वथा युक्तिसंगत ही है ।

४. नृसिंह - नृसिंह अथवा नरसिंह शब्द नर और सिंह नामक दो शब्दों के योग से बना है । नर शब्द प्राण अथवा चेतना का वाचक है । उच्च कोषस्थ दिव्य चेतना जब मनुष्य के अन्नमय कोष में अवतरित होती है, तब अन्नमय कोष की चेतना नर चेतना कहलाती है । अथवा ऐसा भी कह सकते हैं कि उच्च कोशों में स्थित दिव्य प्राण जब अन्नमय कोश में अवतरित होते हैं, तब अन्नमय कोश के प्राण नर प्राण कहलाते हैं । सिंह शब्द शक्ति का प्रतीक है । इस प्रकार नर और सिंह शब्दों के योग से अर्थ हुआ - स्थूल शरीर के स्तर पर अवतरित दिव्य चेतना शक्ति । स्थूल शरीर में क्रियाशील सामान्य चेतना के द्वारा जहां मनुष्य जीवन के सामान्य कार्यों को ही सम्पन्न कर पाता है, वहीं दिव्य चेतना शक्ति का विनियोग वह देहभाव की समाप्ति रूप विशिष्ट कार्य को सम्पन्न करने में ही करता है । इसलिए स्थूल शरीर के स्तर पर यह दिव्य चेतना शक्ति अवतरित भी तभी होती है जब मनुष्य पूरी तरह से देहभाव का विनाश करने और आत्मभाव में स्थित होने के लिए तत्पर हो ।

          इस दिव्य चेतना शक्ति अर्थात् नृसिंह को सम्यक् एवं सरल रूप में समझने के लिए भौतिक विज्ञान के तापगतिकी के दूसरे सिद्धान्त(second law of thermodynamics) को समझना उपयोगी होगा । इस नियम के अनुसार कोई भी पदार्थ पहले व्यवस्था(ordered state) से अव्यवस्था (chaotic state) में जाता है तथा फिर किसी प्रबल शक्ति के हस्तक्षेप अथवा पदार्पण (intervention) से अव्यवस्था (chaotic state) से पुनः व्यवस्था(ordered state) में आता है । यही नियम अध्यात्म के क्षेत्र में भी क्रियाशील है । अध्यात्म के क्षेत्र में आत्मभाव में स्थिति को व्यवस्था(ordered state) तथा देहभाव में स्थिति को अव्यवस्था(chaotic state) कहा जाता है । प्रस्तुत कथा में हिरण्यकशिपु प्रबल देहभाव का प्रतीक होने से अव्यवस्था की स्थिति है । इस अव्यवस्था से व्यवस्था में प्रवेश करने के लिए जिस प्रबल दिव्य चेतना शक्ति का पदार्पण अनिवार्य है, उसे ही कथा में नृसिंह कहा गया है । इस नृसिंह रूप दिव्य चेतना शक्ति के विनियोग से ही हिरण्यकशिपु रूपी अव्यवस्था का विनाश और प्रह्लाद रूपी व्यवस्था की स्थापना होती है ।

५. स्तम्भ और हिरण्यकशिपु द्वारा उसका ध्वंस - स्तम्भ शब्द मन की मान्यता का प्रतीक है । जैसे एक भवन स्तम्भों पर खडा होता है, वैसे ही मनुष्य का जीवन भी मन की मान्यताओं पर खडा होता है । मन की मान्यताएं अनेक हैं, परन्तु मूलभूत मान्यता है - मनुष्य के मन का यह मान लेना कि मैं देहमात्र हूं । यह सत्य है कि प्रत्येक मनुष्य जब इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर आता है, तब अपने वास्तविक शुद्ध आत्मस्वरूप में स्थित होता है, परन्तु जन्मों - जन्मों की एक लम्बी यात्रा में देह के ही दिखाई पडने तथा आत्मा के अदृश्य रहने से वह शनैः - शनैः आत्मस्वरूप को भूलता जाता है और दृश्य देह को ही सत्य एवं सब कुछ मानने लगता है । धीरे - धीरे ज्ञान का लोप होने से यह मान्यता इतनी दृढमूल होती जाती है कि फिर देहभाव(देहाभिमान) के आधार पर ही जीवन चलने से जीवन में दु:खों का प्रादुर्भाव हो जाता है । देह के सम्बन्धों के आधार पर सबसे पहले मनुष्य के भीतर अपने -पराए का विचार उत्पन्न होता है और फिर अपने - पराए के विचार से राग - द्वेष, कामना, तृष्णा, ईर्ष्या जैसे नकारात्मक भाव उत्पन्न हो जाते हैं । इससे मनुष्य का दृष्टिकोण स्वार्थपरक हो जाता है और स्वार्थपरक दृष्टिकोण से वह कर्म भी उसी आधार पर स्वार्थपूर्ण होकर करने लगता है । स्वार्थपूर्ण कर्मों की बार - बार आवृत्ति आदत में बदल जाती है और यह आदत ही मनुष्य के जीवन में दु:खों को उत्पन्न कर देती है । अतः दु:खों से बचने का प्राथमिक स्तर पर एक ही उपाय है - दुःख की जड को ही काट देना और जड है - मन की यह दृढ मान्यता कि मैं देह हूं । प्रस्तुत कथा का 'स्तम्भ ' यही है ।

          कथा संकेत करती है कि देहभाव में रहते हुए प्रत्येक मनुष्य को स्वयं ही अपनी इस प्रबल मान्यता को काटना है । मान्यता को काटने का एकमात्र उपाय ज्ञान है । जिस दिन देहाभिमानी मनुष्य (हिरण्यकशिपु) इस ज्ञान को धारण कर लेता है कि श्रीहरि ही समस्त जगत के आधार हैं, समस्त रूपों में वही विद्यमान हैं, ज्ञान, आनन्द, सुख तथा प्रेम के मूल स्रोत वही हैं, सर्वदा, सर्वत्र सब वस्तुओं, व्यक्तियों तथा स्वयं में उन्हीं भगवान् का दर्शन करना चाहिए - उसी दिन मन की इस मान्यता का ध्वंस हो जाता है कि मैं सबसे पृथक् मात्र देहस्वरूप हूं ।

          इस मान्यता(स्तम्भ) के ध्वंस के पश्चात् ही मनुष्य में अद्भुत, दिव्य चेतना शक्ति का प्रादुर्भाव होता है, जिसे नृसिंह भगवान् कहा गया है । यह दिव्य चेतना शक्ति देहाभिमान रूप हिरण्यकशिपु का वध करके मनुष्य - मन के सिंहासन पर आत्मसत्ता को स्थापित कर देती है जिसे कथा में प्रह्लाद नाम दिया गया है ।

६. हिरण्यकशिपु द्वारा प्रह्लाद को मारने के अनेक प्रयत्न - कथा में कहा गया है कि हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को कभी हाथी के पैरों तले कुचलवाया, कभी सर्पों से डसवाया, कभी आग में जलवाया, कभी आंधी में डाला, कभी समुद्र में डलवाया, कभी पर्वत से फिंकवाया, कभी अंधेरी कोठरी में बन्द कराया तथा कभी मायाओं का प्रयोग आदि कराया परन्तु प्रह्लाद मरा नहीं ।

          देहाभिमानी मनुष्य अपनी तर्कपूर्ण बुद्धि को ही सर्वोपरि समझता हुआ अन्तरात्मा की श्रेष्ठता को स्वीकार नहीं करता । यही बुद्धि रूपी हाथी के पैरों तले आत्मा रूपी प्रह्लाद का कुचलना है ।

          देहाभिमानी मनुष्य की राग, द्वेष, ईर्ष्या आदि विषैली वृत्तियां ही वे विषैले सर्प हैं जो उसके शान्तस्वरूप आत्मा(प्रह्लाद) को डंसती हैं ।

          देहाभिमानी मनुष्य का क्रोध ही वह अग्नि है जिसमें वह प्रेमस्वरूप आत्मा(प्रह्लाद) को जलाकर भस्म कर देना चाहता है ।

          देहाभिमानी की वासनाएं ही वह आंधी है जिसमें शक्तिस्वरूप आत्मा(प्रह्लाद) उड जाता है ।

          उसकी तृष्णाएं, कामनाएं ही वह समुद्र है जिसमें शुद्ध - स्वरूप आत्मा(प्रह्लाद) डूब जाता है ।

          उसका अहंकार ही वह पर्वत है जिससे आनन्दस्वरूप आत्मा (प्रह्लाद ) लुढका दिया जाता है ।

          उसका मोह, ममता तथा आसक्ति ही वह माया है जिसमें सुखस्वरूप आत्मा नष्ट होता है । तथा अज्ञान ही वह अन्धकारपूर्ण कोठरी है जिसमें ज्ञानस्वरूप आत्मा बन्द कर दिया जाता है ।

७. हिरण्यकशिपु के वध से प्रकृति शक्तियों की प्रसन्नता - कथा में कहा गया है कि हिरण्यकशिपु ने प्रकृति की समस्त शक्तियों - देव, ऋषि, पितर, गन्धर्व, सिद्ध, विद्याधर, चारण, मनु, प्रजापति, यक्ष प्रभृति सभी को अपने आधीन कर लिया था और उनके स्थान छीन लिए थे । इसलिए हिरण्यकशिपु का वध हो जाने पर सभी अत्यन्त प्रसन्न हुए और अपने - अपने स्थानों पर अधिष्ठित हुए ।

          हिरण्यकशिपु मनुष्य मन के देहभाव अथवा देहाभिमान का प्रतीक है और देव, ऋषि, पितर, यक्ष, सिद्ध, विद्याधर, अप्सरा आदि शक्तियां मनुष्य की स्थूल, सूक्ष्म तथा कारण शरीरगत चेतना के विविध क्रियाकलाप हैं । ऐसा प्रतीत होता है कि उपर्युक्त कथन के द्वारा देहाभिमानी मन के स्थूल -  सूक्ष्म तथा कारण शरीर पर पडने वाले प्रभावों की ओर इंगित किया गया है । यह तो स्पष्ट ही है कि देहाभिमानी मन के कारण सर्वप्रथम मनुष्य के विचारों में नकारात्मकता आती है और फिर नकारात्मक विचार स्थूल शरीर की क्रियाओं को प्रभावित करते हैं । नकारात्मक विचारों के कारण स्थूल शरीर की शक्तियां, प्रणालियां सम्यक् प्रकार से अपने - अपने कार्य को सम्पन्न करने में असमर्थ हो जाती हैं, फलस्वरूप शरीर अस्वस्थ हो जाता है । इसके विपरीत, आत्मस्वरूप में स्थिति में मन के द्वन्द्व समाप्त हो जाते हैं तथा सकारात्मकता में स्थित होने से समस्त शक्तियां अपने - अपने कार्य को सुचारु रूप से सम्पन्न करती हैं और शरीर स्वस्थ रहता है । आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी सकारात्मक - नकारात्मक विचारों के स्वास्थ्य पर पडने वाले प्रभावों को स्वीकार करके इस दिशा में अधिक क्रियाशील हो गया है ।

कथा का अभिप्राय

          प्रस्तुत कथा के माध्यम से प्रबल देहभाव में स्थित मन के आत्मभाव में स्थापित होने की प्रक्रिया का अद्भुत ढंग से विवेचन किया गया है । कथा संकेत करती है कि आत्मस्वरूप के प्रति सोए हुए, प्रबल देहभाव में स्थित मनुष्य को उसका अपना ही आत्मा धीरे - धीरे जगाने का प्रयत्न करता रहता है । देहाभिमानी मन जागना नहीं चाहता और जगाने वाले आत्मा को ही मार डालना चाहता है परन्तु आत्मा अनुग्रहशील होकर शनैः - शनैः चोट करता ही जाता है । आत्मा द्वारा जगाने की यह चोट जब लगातार देहाभिमानी मन पर पडती ही रहती है, तब एक दिन ऐसा आता है जब मनुष्य उस चोट के कारण ही अर्जित किए हुए ज्ञान द्वारा अपने ही मन की इस दृढीभूत मान्यता को काट देता है कि मैं देहमात्र हूं ।

          कथा पुनः संकेत करती है कि इस मान्यता के काट देने मात्र से देह भाव समाप्त नहीं हो जाता । देहभाव की पूर्णतया समाप्ति तभी सम्भव होती है जब मनुष्य दृढीभूत मान्यता को काटने से अवतरित हुई अपनी दिव्य चेतना(पुरुषार्थ) शक्ति का भी उस कार्य में विनियोग करता है । सबसे पहले देहाभिमानी मन के ऊपर अपने ही अन्तरात्मा द्वारा लगातार सद्ज्ञान की चोट, फिर भ्रमपूर्ण मान्यता का विनाश , अनन्तर दिव्य पुरुषार्थ शक्ति का अवतरण एवं उसका विनियोग - इस प्रकार इन तीनों के समन्वित योग से ही देह भाव का विनाश होकर मन के सिंहासन पर आत्मभाव की स्थापना संभव होती है ।