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दक्ष कथा का रहस्यात्मक विवेचन

- राधा गुप्ता

भाग १: मनुनन्दिनी प्रसूति से दक्ष प्रजापति का विवाह एवं १६ कन्याओं की उत्पत्ति - एक विवेचन

कथा का संक्षिप्त स्वरूप इस प्रकार है -

          स्वायम्भुव मनु की तीन कन्याएं थी - देवहूति, प्रसूति तथा आकूति । देवहूति का विवाह कर्दम प्रजापति से, आकूति का विवाह रुचि प्रजापति से तथा प्रसूति का विवाह दक्ष प्रजापति से हुआ । प्रसूति एवं दक्ष से १६ कन्याएं उत्पन्न हुई । इनमें श्रद्धा, मैत्री, दया, शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्रिया, उन्नति, बुद्धि, मेधा, तितिक्षा, ह्री और मूर्त्ति नामक १३ कन्याएं धर्म को प्रदान की गई । इन १३ कन्याओं में श्रद्धा ने शुभ को, मैत्री ने प्रसाद को, दया ने अभय को, शान्ति ने सुख को, तुष्टि ने मोद को, पुष्टि ने अहंकार को, क्रिया ने योग को, उन्नति ने दर्प को, बुद्धि ने अर्थ को, मेधा ने स्मृति को, तितिक्षा ने क्षेम को, ह्री ने विनय को तथा मूर्ति ने नर - नारायण ऋषियों को जन्म दिया । नर - नारायण ही अर्जुन और कृष्ण के रूप में अवतीर्ण हुए । १४वी स्वाहा नामक कन्या अग्निदेव को प्रदान की गई जिससे एक ही अग्नि ४९ रूपों में प्रादुर्भूत हुई । १५वी स्वधा नामक कन्या पितरों को प्रदान की गई जिससे वयुना और धारिणी नामक कन्याएं उत्पन्न हुई । तथा १६वी सती नामक कन्या महादेव जी को प्रदान की गई जिससे कोई पुत्र नहीं हुआ क्योंकि सती ने युवावस्था में ही योग द्वारा देह का त्याग कर दिया था ।

कथा में निहित रहस्यात्मकता

          कथा पूर्णरूपेण प्रतीकात्मक है और इसके माध्यम से निम्नलिखित तथ्यों को प्रकट किया गया है -

१. 'दक्ष' मनश्चैतन्य अर्थात् जीवात्मा का वह बल है जो व्यक्तित्व को दक्षता(कुशलता) प्रदान करता है । यह दक्ष नामक बल प्रत्येक मनुष्य की मनश्चेतना में संभावना अथवा सामर्थ्य (potential) के रूप में विद्यमान है ।

२. सम्भावना के रूप में विद्यमान यह दक्ष नामक बल जब प्रकट होता है, तब व्यक्तित्व को दक्षता प्रदान करने वाली अनेक विशिष्टताओं को उत्पन्न करता है । ये विशिष्टताएं हैं - श्रद्धा, मैत्री, दया, शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्रिया, उन्नति, बुद्धि, मेधा, तितिक्षा, ह्री, मूर्ति, स्वाहा, स्वधा तथा सती । इन १६ विशिष्टताओं को ही कथा में दक्ष एवं प्रसूति की १६ कन्याएं कहा गया है । ये विशिष्टताएं तथा इनसे उत्पन्न अन्य अनेक विशिष्टताएं दक्ष - बल की 'प्रजा' कहलाती हैं । इसलिए दक्ष को कथा में 'प्रजापति' अर्थात् प्रजाओं का पति कहा गया है । पौराणिक साहित्य में 'पति' शब्द का अर्थ होता है - लक्ष्य । अतः प्रजापति शब्द का अर्थ हुआ - विशिष्टता रूप प्रजा को उत्पन्न करने के लक्ष्य से युक्त ।

३. परन्तु प्रत्येक मनुष्य की मनश्चेतना के भीतर संभावना(potential) के रूप में विद्यमान यह दक्ष नामक बल तब तक प्रकट नहीं होता, जब तक ऊर्ध्वमुखी उच्च मन की क्रियाशक्ति का इस दक्ष - बल के साथ संयोग नहीं होता अर्थात् उच्च मन के सक्रिय होने पर ही दक्ष बल प्रकट होता है । उच्च मन की सक्रियता का अर्थ है - जीवन के प्रत्येक स्तर पर स्वार्थपरक दृष्टिकोण से हटकर परमार्थपरक दृष्टिकोण से कार्य करना । उच्च मन की इस सक्रियता को ही कथा में स्वायम्भुव मनु की पुत्री 'प्रसूति' कहा गया है । पूर्व लेख 'वराह अवतार कथा का रहस्यार्थ' में हम स्पष्ट कर चुके हैं कि स्वायम्भुव मनु का अर्थ है - ऊर्ध्वमुखी उच्च मन तथा उसकी तीन पुत्रियां - देवहूति, प्रसूति तथा आकूति क्रमशः ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति तथा भाव या इच्छा शक्ति की प्रतीक हैं । इस क्रियाशक्ति का मनश्चेतना में विद्यमान 'दक्ष - बल' से संयोग होना ही कथा में प्रसूति का दक्ष प्रजापति से विवाह होना कहा गया है ।

४. उच्च मन की सक्रियता अर्थात् प्रसूति दक्ष - बल से संयुक्त होकर व्यक्तित्व में श्रद्धा, मैत्री, दया, शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्रिया, उन्नति, बुद्धि, मेधा, तितिक्षा, ह्री(लज्जा) तथा मूर्त्ति( मूर्त्तरूपता) नामक उन १३ विशिष्टताओं को उत्पन्न करती है जो धर्म से संयुक्त होकर जीवन में शुभ, प्रसाद, अभय, सुख, मोद, योग, अर्थ, स्मृति, क्षेम, विनय, चेतना की जागरूकता तथा संकल्प का निर्माण करती हैं । धर्म का अर्थ है - व्यष्टि और समष्टि जीवन में क्रियाशील वे नियम(laws) जो हमें धारण करते हैं । पुष्टि और उन्नति नामक विशिष्टताओं से व्यक्तित्व में अहंकार और दर्प भी उत्पन्न होता है जिनका सुचारु रूप से नियन्त्रण आवश्यक है ।

५. उच्च मन की सक्रियता(प्रसूति) दक्ष - बल से संयुक्त होकर 'स्वाहा' और 'स्वधा' नामक दो कन्याओं को उत्पन्न करती है । स्वाहा का अर्थ है - स्व+ आ+ हा अर्थात् स्व को चारों ओर से छोड देना, समर्पित कर देना, तथा स्वधा का अर्थ है - स्व + धा अर्थात् स्व को धारण करना । स्वाहा शब्द में स्व का अर्थ है- वह व्यक्तित्व जिसे मनुष्य मां के गर्भ से लेकर आता है अर्थात् 'मैं' देवस्वरूप हूं ' इस विचार से सम्बन्धित भाव, कर्म आदि तथा स्वधा शब्द में स्व का अर्थ है - वह ज्योvतिर्मय व्यक्तित्व जिसे मनुष्य पुरुषार्थ द्वारा प्राप्त करता है अथवा प्राप्त करना चाहता है । उच्च मन की सक्रियता के दक्ष - बल से संयुक्त होने पर मनुष्य अपने मिथ्या स्वरूप 'मैं देहमात्र हूं' का सर्वथा त्याग कर देता है, जिसे कथा में स्वाहा नामक कन्या की प्राप्ति होना कहा गया है और अपने वास्तविक स्वरूप 'मैं आत्म रूप हूं' को धारण कर लेता है जिसे कथा में स्वधा नामक कन्या की प्राप्ति होना कहा गया है । 'मैं देहमात्र हूं' इस भाव का त्याग अर्थात् स्वाहा की प्राप्ति होने पर मनुष्य की चेतना अन्नमय , प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय आदि सभी स्तरों पर नूतन, पवित्र चेतना के रूप में आविर्भूत होती है । इसी तथ्य को कथा में यह कहकर इंगित किया गया है कि स्वाहा नामक कन्या अग्निदेव को प्रदान की गई जिससे पावक, पवमान, शुचि प्रभृति ४९ अग्नियां आविर्भूत हुईं । ४९ की संख्या का रहस्य अभी अन्वेषणीय है । भौतिक धरातल पर यज्ञीय कर्मकाण्ड के अन्तर्गत अग्नि में हवि समर्पित करते समय भी स्वाहा शब्द के उच्चारण का विधान है । इस विधान से भी उपर्युक्त वर्णित इसी तथ्य को इंगित किया गया है कि मनुष्य जब देव शक्तियों के वर्धन हेतु उन्हें दिव्य भोजन(हवि) समर्पित करे, तब अपने देहभाव के त्याग रूप भाव को भी समर्पित करे अर्थात् 'मैं' देहभाव का त्याग करता हूं इस अर्थ के वाचक स्वाहा शब्द का उच्चारण करे । देहभाव आत्मभाव(एकत्व भाव) के विपरीत पृथक्ता के भाव से सम्बन्ध रखता है और पृथक्ता के भाव स्वार्थ सम्बन्धी विचारों को उत्पन्न करके मनुष्य को दुःख की ओर ले जाते हैं ।

          इसी प्रकार कथा में कहा गया है कि दक्ष एवं प्रसूति से उत्पन्न स्वधा नामक कन्या पितरों को प्रदान की गई जिससे वयुनम् और धारिणी नामक दो कन्याएं उत्पन्न हुईं । जैसा कि पूर्व में कहा जा चुका है, स्वधा का अर्थ है - ज्योvतिर्मय व्यक्तित्व अर्थात् आत्मस्वरूप को धारण करना और पितरों का अर्थ है - चेतन - अचेतन मन में बसे हुए संस्कारों से प्रसूत वे सहज वृत्तियां जो स्थूल तथा सूक्ष्म देह के स्तरों पर क्रियाशील रहती हैं और जिन पर मनुष्य का नियन्त्रण नहीं होता । ये सहज वृत्तियां ही नियन्त्रण में न होने के कारण मनुष्य के लक्ष्य में बाधक भी होती हैं । सामान्य मनुष्य और महापुरुष में यही अन्तर होता है कि जहां सामान्य मनुष्य इनके नियन्त्रण में होता है, वहीं ये सहज वृत्तियां महापुरुष के नियन्त्रण में होती हैं । अतः ये सहज वृत्तियां मनुष्य के नियन्त्रण में रहें - इसके लिए यह आवश्यक है कि ज्योvतिर्मय व्यक्तित्व अर्थात् स्वधा को इन पितरों अर्थात् संस्कार - प्रसूत सहज वृत्तियों से जोडकर इन्हें अपने नियन्त्रण में रखा जाए । उदाहरण के लिए, राग, द्वेष, भय, आसक्ति आदि मानव मन की सहज वृत्तियां हैं । देह भाव से जुडकर अर्थात् मैं - मेरे के आधीन होकर मनुष्य न चाहते हुए भी इन वृत्तियों के आधीन हो जाता है । आत्मभाव म%E